प्रेग्नेंसी से हो जाए पोस्पार्टम डिप्रेशन तो, कैसे पहचानें लक्षण और कैसे करें बचाव?


प्रेग्नेंसी से हो जाए पोस्पार्टम डिप्रेशन तो, कैसे पहचानें लक्षण और कैसे करें बचाव?
जब समाज या परिवार के बीच किसी महिला के गर्भवती होने का पता चलता है, तो कई तरह के माहौल निर्मित होते हैं। कहीं खुशियां मनाई जाती हैं, तो कहीं समाज के प्रतिकूल नारी के गर्भ धारण पर उसे अपराधी की तरह समझा जाता है। लेकिन इन सब के बीच वो महिला जिसने गर्भ धारण किया, उसमें न जाने कितने चाहे अनचाहे परिवर्तन कृत्रिम या प्राकृतिक तरीकों से आते हैं। जो उस महिला के लिए कई तरह की बीमारियों की जड़ बन जाते हैं। इन्हीं में से एक बीमारी जिसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन कहा जाता है। जब कोई महिला इस अवसाद से ग्रसित हो जाए तो बीमारी के लक्षण, बचाव, होने वाले परिवर्तनों, व्यवहारिक बदलाव, आहार में कमी या अधिकता आदि कई तरह की चीजें होती हैं।  जिससे जुड़े तथ्यों को समझना जरूरी है।

किसी महिला के द्वारा बच्चे को जन्म देने के उपरांत परिवर्तनों की ऐसी कड़ी जुड़ती है जो उस मां के लिए बेहद ही अहम होती है। किसी औरत के लिए बच्चे को जन्म देना अत्यंत तनावपूर्ण, थकान भरी लेकिन नई जिम्मेदारियों से भरी एक शुरुआत वाली प्रक्रिया होती है।  इस प्रक्रिया के दौरान नींद न आना, भूख न लगना, कमजोरी महसूस करना, लघु काल के लिए हों तो इसे बेबी ब्लूज के लक्षण माने जाते हैं। जिससे कुछ ही समय में अधिकतर महिलाएं उभर आती हैं।

क्यों उत्पन्न होते हैं ऐसे कारक?

प्रसव पीड़ा के फौरन बाद महिलाओं में हार्मोनल चेंजेज आते ही आते हैं। जिसमें बेवजह भावनात्मक हो जाना, रोना, नींद न आना, उदास रहना, चिड़चिड़ापन आदि शामिल हैं। बेबी ब्लूज एक सामान्य प्रक्रिया है जिसमें चिंता की बात नहीं होती।

लेकिन जब बच्चे के पालन पोषण में असमर्थता के भाव आए व आत्मघाती कदम उठाने का विचार, खुद को दोषी मानना, अकारण गुस्सा होकर आपा खो देना, यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन यानी प्रसवोत्तर अवसाद के लक्षण कहलाते हैं, जो किसी भी महिला के लिए गंभीर समस्या बन सकती है। जिसके निवारण के लिए चिकित्सक के पास जाना अत्यंत आवश्यक है। इससे के बारे में खुलकर बात करने की आवश्यकता होती है जिससे जल्द इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सके।

कब हो सकता है प्रसवोत्तर अवसाद?

शिशु के जन्म के पश्चात 24 घण्टे के भीतर भी इस अवसाद के लक्षण आ सकते हैं अथवा 8 से 10 दिन भी लग सकते हैं। इसमें जननी और बच्चे के परिवारजनों को खास ख्याल रखना जरूरी होता है क्योंकि जब ये डिप्रेशन पनपता है तो मां, बच्चे के साथ स्वयं को भी नुकसान पहुंचा सकती है।

अवसाद से मां को बचाने क्या उपाय करें?

सबसे जरूरी चीज है कि चिकित्सक की सलाह लेते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से इलाज लें। कोई भी महिला मां बनते ही सर्वप्रथम अपने बच्चे के साथ परिचित होती है उसे दुलारती या पुचकारती है, जब बच्चा रोता है तो उसे चुप कराने का प्रयास करती है, स्तनपान कराती है ये समस्त चीजों के करने से डिप्रेशन नहीं हो पाता। लेकिन अवसाद ग्रस्त होने पर उसमें नकारात्मक भाव आता है वह स्वयं के जन्में शिशु से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ पाती, आत्महत्या का प्रयास कर सकती है।

डिस्क्लेमर: इस लेख के सुझाव सामान्य जानकारी के लिए हैं। इन सुझावों और जानकारी को किसी डॉक्टर या मेडिकल प्रोफेशनल की सलाह के तौर पर न लें। किसी भी बीमारी के लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।


Related Posts