जैस्टेशनल डायबिटीज (गर्भावधि मधुमेह) क्या होता है? जानिए इसके प्रभाव और बचाव की पूरी जानकारी


जैस्टेशनल डायबिटीज (गर्भावधि मधुमेह) क्या होता है? जानिए इसके प्रभाव और बचाव की पूरी जानकारी

गर्भावधि मधुमेह तब होता है, जब गर्भावस्था में शरीर में रक्त शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। गर्भावस्था के दौरान रक्त में शर्करा बढ़ जाती है। हमारा शरीर इंसुलिन नामक हार्मोन का पूरी मात्रा में उत्पादन नहीं कर रहा होता, तो आपकी रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) का स्तर बढ़ सकता क्योंकि इंसुलिन शर्करा की मात्रा को सामान्य रखने में सहायता करता है।


इंसुलिन, शरीर की मांशपेशियों और ऊतकों की सहायता करता है, वे रक्त शर्करा का प्रयोग कर सकते हैं। इंसुलिन, शरीर में एक्स्ट्रा शर्करा जिसकी अभी जरूरत न हो उसका संग्रहण करता है।


जब आप गर्भवती होती हैं तो शरीर इंसुलिन की मात्रा अधिक बनाता है। खासतौर पर गर्भावस्था के मध्य समय में ऐसा होता है। आपको अतिरिक्त इंसुलिन की इसलिए जरुरत होती है, क्योंकि अपरा (प्लेसेंटा) के हार्मोन आपके शरीर को इसके प्रति कम प्रतिक्रियाशील बना देते हैं। यदि शरीर अतिरिक्त इन्सुलिन की मात्रा को पूरा नही कर पाते तो शरीर में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है।

 

अक्सर ऐसी सिथति में आपको गर्भावधि मधुमेह हो सकता है। शरीर में रक्त शर्करा का स्तर बढ़ने पर आपके और शिशु दोनों के लिए परेशानी हो सकती है। इसलिए गर्भावस्था में किसी भी महिला को ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है। गर्भावधि मधुमेह की समस्या काफी नार्मल है। यह करीब छः गर्भवती महिलाओं में से एक को होती है।


इस गर्भावधि मधुमेह की सबसे अच्छी बात यह है कि ये बच्चे के पैदा होने के बाद ठीक हो जाती है, क्योंकि ये अन्य मधुमेह से अलग होता है। वैसे तो गर्भावधि मधुमेह के कोई खास लक्षण नहीं होते पर कुछ लक्षण ऐसे होते है जिन्हें पहचान सकतें है।


1.  थकान


2.  मुंह सूखना


3.  अधिक प्यास लगना


4. अत्याधिक पेशाब आना


5.  थ्रश जैसे कुछ संक्रमण बार-बार होना


6.  धुंधला दिखाई देना


ये समस्याएं गर्भावस्था में आम होती हैं लेकिन इसके लिए डॉक्टर से जरूर सुझाव लेना चाहिए।


निम्नलिखित कुछ चीजें हैं जो गर्भावधि मधुमेह को बढ़ाती हैं

1. सबसे पहले अगर आपके शरीर का मांस इंडेक्स 25 या इस से अधिक हो।

2. अगर आपका पहला बचा 4.5 या इस से ज्यादा वजन के बच्चे को जन्म दे चुकी हैं।

3. अनुवांशिकों में ऐसी समस्या हो या आपको पहले ऐसी समस्या हो चुकी है तो भी गर्भावधि मधुमेह हो सकता है।


सबसे बड़ा सवाल क्या गर्भावधि मधुमेह को ठीक किया जा सकता है?  समस्या ये है कि ऐसा नहीं हो सकता, कुछ ऐसे घरेलू नुस्खे या उपाय हैं, जिसके जरिये इसके खतरों को कम किया जा सकता है।


1. स्वस्थ आहार ज्यादा खाएं

 

इस समस्या से बचने के लिए ऐसे कार्बोहाइड्रेट लेने चाहिए जो शरीर में धीरे से शुगर पैदा करें। जैसे

साबुत अनाज और अपरिष्कृत अनाज जैसे भूरे चावल, चोकर, जई या रागी। इसलिए, आप चपातियां साबुत आनाज के आटे से बनाइए या फिर नाश्ते में जई का दलिया लीजिए। साथ ही, वसा युक्त मांस के बदले कम वसा वाले प्रोटीन जैसे कि चिकन, मछली और दलहन जैसे राजमा आदि लीजिए।आप मास को माइक्रोवेव में भुने और खाने में भी तेल का प्रयोग कम करें।


2. व्यायाम खाने के साथ साथ शरीर को भी एक्टिव रखे शरीर सक्रिय रहेगा तो ब्लड प्रेशर और शुगर भी सही रहेंगे।गर्भावस्था में तैराकी,टहलना,और योग जैसे व्यायाम सेहत के लिए अच्छे होते हैं।


3. वजन पर नियंत्रण अगर गर्भावस्था से पहले आपका वजन सीमित था तो इस दौरान आपका वजन 9.5 किलो से 10 तक बढ़ सकता है।


गर्भावधि मधुमेह की जांच


वैसे तो आमतौर पर इसका पता नही लगाया जा सकता कि गर्भावधि मधुमेह है या नहीं परन्तु गर्भावस्था के दौरान यूरिन टेस्ट होता है जो जरूरी प्रक्रिया है। यूरिन टेस्ट से ही आपके गर्भावधि मधुमेह का पता लगाया जा सकता है। क्योंकि इस से शरीर में शर्करा के स्तर का पता चलता है। यह स्तर सामान्य से ज्यादा है, तो यह गर्भावधि मधुमेह होने का संकेत हो सकता है। यूरिन की जांच में शुगर का स्तर बढ़ा हुआ होगा, तो डॉक्टर आपको ग्लूकोस टोलरेंस टेस्ट (जीटीटी) करावाने के लिए कहेंगी। यह गर्भावस्था के 24 और 28 सप्ताह के बीच कराया जाता है।


आपका यह टेस्ट खाली पेट किया जाता है, इसमें शरीर से खून का नमूना लिया जाता है, फिर इसकी जांच की जाती है ताकि रक्त शर्करा का माप पता चल सके। फिर अपको ग्लूकोज पिलाया जायगा और 2 घण्टे बाद फिर से खून का नमूना लेकर जांच की जएगी जिससे पता चल सके शर्करा का शरीर पर क्या असर पड़ता है?


गर्भ में शिशु पर असर 


वैसे तो इस परिस्थिति में भी महिलाएं स्वस्थ शिशु को जन्म देती हैं पर कई बार मधुमेह की मात्रा बढ़ने पर ये शिशु का वजन बढ़ा देती है। क्योंकि यह अपरा (प्लेसेंटा) से होते हुए आपके शिशु तक पहुंच जाती है। अधिक वजन वाला शिशु कई बार जन्म के समय मुश्किल पैदा कर सकता है। कई बार इसके कारण मृत शिशु के जन्म हो सकता है परंतु ऐसा केवल मुश्किल परिस्थितियों में होता है। कई बार ज्यादा मधुमेह के कारण शिशु के आस-पास तरल या पानी जमा हो जाता है। जिसे पॉलीहाइड्रेमनिओज कहा जाता है।


जन्म के बाद शिशु पर क्या प्रभाव पड़ेगा?


अगर आपको गर्भावधि मधुमेह था तो जन्म के बाद शिशु की कुछ समय तक विशेष देखभाल की जायेगी शुरुआत में शिशु के शर्करा के स्तर में कमी आ सकती है, इसे हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है। इसके लिए उसे कुछ समय शिशु देखभाल कक्ष में रखा जा सकता है। जिनको गर्भावधि मधुमेह होता है उनके बच्चों को आगे चलकर मधुमेह और मोटापे की समस्या हो सकती है। इस के बचाव के लिए बच्चों को अच्छा आहार और व्यायाम की आदत डालें।


क्या शिशु के जन्म के बाद भी मधुमेह रहेगी


अक्सर देखा गया है कि शिशु के जन्म के बाद ये समस्या स्वयं खत्म हो जाती है। आपकी डॉक्टर शिशु जन्म के बाद भी मधुमेह जांच के लिए कह सकती हैं। आपको प्रसव के बाद छह हफ्तों पर होने वाली जांच में भी मधुमेह जांच कराने के लिए कहा जाएगा।

डिस्क्लेमर: इस लेख के सुझाव सामान्य जानकारी के लिए हैं। इन सुझावों और जानकारी को किसी डॉक्टर या मेडिकल प्रोफेशनल की सलाह के तौर पर न लें। किसी भी बीमारी के लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।


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