प्रसव के लिए दो तरह की डिलीवरी सबसे ज्यादा प्रचलित है। जिनमें से एक सिजेरियन डिलीवरी है और दूसरी वैजाइनल डिलीवरी है। आमतौर पर महिलाएं और डॉक्टर भी नॉर्मल यानी की वैजाइनल डिलीवरी को ज्यादा बेहतर मानते हैं। क्योंकि इसके बाद जल्दी रिकवरी हो जाती है। वहीं सिजेरियन डिलीवरी के बाद महिलाओं को पूरी तरह से ठीक होने में महीने लग जाते हैं। तो वहीं कुछ महिलाएं सिजेरियन डिलीवरी कराती हैं, क्योंकि उनको नॉर्मल डिलीवरी का दर्द नहीं सहना होता है।
ऐसे में इस बीच हमेशा इस बात को लेकर बहस छिड़ी रहती है कि नॉर्मल और सिजेरियन डिलीवरी दोनों में क्या ज्यादा बेहतर है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको दोनों के फायदे और नुकसान के बारे में बताने जा रहे हैं।
सिजेरियन डिलीवरी
सिजेरियन डिलीवरी में पेट को काटकर हल्के हाथों से बच्चे को बाहर निकाला जाता है। जिससे बच्चे पर कोई प्रेशर या दबाव नहीं पड़ता है। बच्चा बड़े आराम से बाहर आ जाता है।
नॉर्मल डिलीवरी
नॉर्मल डिलीवरी में बच्चा काफी देर तक प्रसव के रास्ते में रहता है। जिस कारण बच्चे को कम ऑक्सीजन मिलने का खतरा रहता है।
फायदे और नुकसान
सिजेरियन डिलीवरी में बच्चे पर किसी तरह के उपकरण का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। जिससे बच्चे पर किसी तरह का जोखिम कम हो जाता है।
वहीं कई बार नॉर्मल डिलीवरी में बच्चे को खींचने के लिए कुछ उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है, जैसे - वैक्यूम या फोरसेप्स आदि। इससे बच्चे को ट्रामा होने का खतरा रहता है।
नॉर्मल डिलीवरी के दौरान कई बार बच्चे को बाहर निकालने के दौरान मूत्र मार्ग या मलाशय को चोट आती है। जिससे डिलीवरी के बाद महिलाओं को पेशाब रोकने में दिक्कत होती है। नॉर्मल डिलीवरी में योनी की मांसपेशियां फट या ढीली हो जाती हैं। जो आगे चलकर सेक्स में प्रॉब्लम और पेशाब न रोक पाने की समस्या होती है। लेकिन यह सभी समस्याएं सिजेरियन डिलीवरी में नहीं होती है।
सिजेरियन डिलीवरी के दौरान दर्द कम होता है। वहीं नॉर्मल डिलीवरी में कई घंटों तक दर्द सहना होता है। लेबर पेन के डर से कई महिलाएं सिजेरियन डिलीवरी को चुनती हैं।
सिजेरियन डिलीवरी कराने से मूत्राशय और योनि को चोट लगने का रिस्क कम हो जाता है। वहीं योनि, गर्भाशय, मूत्राशय या मलाशय के बाहर आने का खतरा भी घट जाता है। इसको पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स कहते हैं। लेकिन सिजेरियन डिलीवरी के बाद रिकवरी करने में काफी समय लगता है।