Health Tips: सिर्फ HbA1c Test के भरोसे न रहें, Diabetes की जांच हो सकती है गलत
- अनन्या मिश्रा
- Mar 13, 2026

वैश्विक स्तर पर डायबिटीज तेजी से बढ़ती हुई क्रॉनिक बीमारी है। बच्चे और बुजुर्ग सभी इसका शिकार हो रहे हैं। अक्सर ब्लड शुगर का सामान्य से ज्यादा बने रहना शरीर को अंदर से खोखला करता है। यही वजह है कि शुगर के मरीजों को नसों, आंखों-किडनी और दिल से संबंधित बीमारियों का खतरा अधिक रहता है। आंकड़ों के हिसाब से भारत में 101 मिलियन से ज्यादा लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं। वहीं 13 करोड़ से अधिक लोग प्री-डायबिटीज का शिकार हैं। इसमें भविष्य में इस बीमारी का खतरा हो सकता है। इस बढ़ते हुए खतरे को भांपते हुए भारत को 'दुनिया का डायबिटीज कैपिटल' कहा जाने लगा है।
बता दें कि इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई बार इसके लक्षण स्पष्ट नहीं होते हैं। लंबे समय तक व्यक्ति बिना जानकारी के इस बीमारी के साथ जीता रहता है। इसलिए नियमित रूप से शुगर की जांच कराना जरूरी हो जाता है। हालांकि शुगर की जांच के लिए HbA1c को सबसे अच्छा टेस्ट माना जाता है। लेकिन क्या वाकई इस टेस्ट पर भरोसा किया जा सकता है।
HbA1c टेस्ट भरोसेमंद होता है या नहीं
इस टेस्ट को लेकर ऐसे सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं, क्योंकि हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में अलर्ट किया गया है कि इस पर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता है। आमतौर पर एनीमिया, क्रोनिक किडनी रोग और पोषण की कमी वाले लोगों में HbA1c टेस्ट के परिणाम विश्वसनीय नहीं माने जा सकते हैं। तो आइए जानते हैं कि इस रिपोर्ट में ऐसा क्यों कहा गया और HbA1c टेस्ट क्या है।
HbA1c यानी ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट एक तरह के खून की जांच है। यह खून में पिछले 2 से 3 महीनों के दौरान शुगर का लेवल कितना रहा है और इसका औसत बताता है।
जब हमारे ब्लड में शुगर अधिक समय तक बनी रहती है, तो यह धीरे-धीरे हीमोग्लोबिन से चिपक जाती है।
ब्लड में जितनी ज्यादा शुगर चिपकेगी, उतना ही HbA1c टेस्ट की रीडिंग अधिक होगी।
डॉक्टर इस टेस्ट को डायबिटीज की सही पहचान और इस बीमारी की गंभीरता को समझने के लिए भरोसेमंद मानते हैं।
आमतौर पर HbA1c का नॉर्मल लेवल 5.7% से कम होना चाहिए। अगर यह 5.7% से 6.4% के बीच है, तो इसको प्री-डायबिटीज कहा जाता है। वहीं 6.5% या इससे ज्यादा आने पर डायबिटीज माना जाता है।
क्या कहती है रिपोर्ट
HbA1c टेस्ट को लेकर एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय क्लिनिकल प्रैक्टिस में HbA1c टेस्ट को टाइप-2 डायबिटीज का पता लगाने और मॉनिटरिंग के लिए उपयोगी माना जाता है।
लेकिन आयरन की कमी, एनीमिया, हीमोग्लोबिनोपैथी, क्रोनिक किडनी रोग और पोषण की कमी वाले लोगों में इस टेस्ट के परिणाम को भरोसेमंद नहीं माना जाता है।
वहीं टाइप-2 डायबिटीज के लिए HbA1c टेस्ट पर लोगों के निर्भर होने पर भी सवाल उठाए हैं।
एक्सपर्ट्स ने कहा है कि हीमोग्लोबिनोपैथी और एनीमिया जैसी कोई भी ऐसी स्थिति जो हीमोग्लोबिन की मात्रा, हीमोग्लोबिन के लाइफस्पैन या इसकी बनावट को प्रभावित करती है। यह HbA1c टेस्ट की रीडिंग पर भी असर डाल सकती है।
एनीमिया पीड़ित लोगों में गलत आ सकती है टेस्ट की रीडिंग
एक रिपोर्ट में कहा गया है कि डायबिटीज के लिए सिर्फ HbA1c टेस्ट पर अकेले निर्भर रहना मिसलीडिंग हो सकता है।
HbA1c उन लोगों में ब्लड ग्लूकोज के लेवल को कम या ज्यादा बता सकता है। जिनमें एनीमिया और आनुवांशिक ब्लड डिसऑर्डर जैसी समस्याएं रही हैं।
भारत की 57% से अधिक महिलाएं आयरन की कमी से एनीमिया से जूझ रही हैं। ऐसे लोगों में HbA1c टेस्ट से डायबिटीज के डायग्नोसिस और मॉनिटरिंग दोनों पर असर पड़ सकता है। साथ ही उनका इलाज भी प्रभावित हो सकता है।
वहीं जिन पुरुषों में G6PD की कमी का पता नहीं चला है, उनमें सिर्फ HbA1c टेस्ट पर निर्भर रहने से डायबिटीज के डायग्नोसिस में 4 साल तक की देरी हो सकती है।
बता दें कि G6PD की कमी एक आनुवंशिक स्थिति होती है। इस स्थिति में बॉडी में 'ग्लूकोज-6-फॉस्फेट डीहाइड्रोजनेज' एंजाइम की कमी होती है। एंजाइम लाल रक्त कोशिकाओं की रक्षा करता है। इस कमी की वजह से RBCs तेजी से टूटने लगता है और शरीर में ब्लड की कमी हो सकती है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
हेल्थ एक्सपर्ट की मानें, तो डायबिटीज के सही निदान के लिए HbA1c टेस्ट के साथ फ्रुक्टोसामाइन और ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट भी किए जाने चाहिए।
जिन लोगों को आनुवांशिक रूप से डायबिटीज की बीमारी का खतरा रहा हो। साथ ही उनको एनीमिया जैसी समस्या भी हैं, उनको शुगर की अन्य जांचें भी कराते रहना चाहिए। जिससे कि ब्लड ग्लूकोज लेवल का सही अंदाजा भी लगाया जा सके।
डिस्क्लेमर: इस लेख के सुझाव सामान्य जानकारी के लिए हैं। इन सुझावों और जानकारी को किसी डॉक्टर या मेडिकल प्रोफेशनल की सलाह के तौर पर न लें। किसी भी बीमारी के लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।